• सच्ची रामायण और हिंदी का कुनबावाद

    Author(s):
    Pramod Ranjan (see profile)
    Date:
    2020
    Group(s):
    Book Reviewing, Communication Studies, Literary Journalism, Sociology
    Subject(s):
    Rāmacāmi, Ī. Ve., Tantai Periyār, 1878-1973, Dalits, Caste, Reference books, Hindi, Social justice in literature, Social justice, Race in mass media, Discourse analysis--Social aspects
    Item Type:
    Essay
    Tag(s):
    Other backward caste, identity politics, lalai singh yadav, Digital media--Social aspects, caste discourse
    Permanent URL:
    https://doi.org/10.17613/rtv4-jp51
    Abstract:
    वर्ष 2022 में मेरे द्वारा संपादित ईवी रामसामी पेरियार के लेखों और भाषणों का संकलन हिंदी में पुस्तकाकार प्रकाशित होने पर एक लेखक ने कुछ ऐसे मुद्दों को लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की थी, जिसका कोई आधार नहीं था। मैंने यह लेख उनके द्वारा इस संबंध में की गई टिप्पणी के उत्तर में लिखा गया था। इस लेख में मैंने बताने की कोशिश की है कि हिंदी के प्रकाशन की दुनिया बुरी तरह के जातिवाद से ग्रस्त है। प्रकाशक आर्थिक लाभ की संभावना के बावजूद चार्तुवर्ण पर गहरी चोट करने वाली पुस्तकें प्रकाशित नहीं करना चाहते। अनेक मामलों में पुस्तक विक्रेता भी ऐसी किताबों को अपने स्टॉल पर नहीं रखने देते। इसके अतिरिक्त इस लेख में यह भी चिन्हित करने की कोशिश की गई है कि वे युवा लेखक, जिनसे समाजिक न्याय के सिद्धांतों को वृहत्तर फलक पर विकसित करने की उम्मीद थी, वे किस प्रकार सोशल मीडिया के प्रसार के बाद जातिवाद की संकीर्णताओं में और अधिक धंसते गए हैं।
    Metadata:
    Published as:
    Online publication    
    Status:
    Published
    Last Updated:
    4 months ago
    License:
    Attribution
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    Item Name: pdf सच्ची-रामायण-और-हिंदी-का-कुनबाबाद_-the-ramayana-a-true-reading-and-sectarianism-in-hindi-belt.pdf
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